Saturday, December 17, 2011
Sunday, March 27, 2011
Sunday, May 23, 2010
Thursday, May 13, 2010
Saturday, May 1, 2010
कटाक्ष (Satire)
सूरत जहाँ की खूब सयानी|
ज़र्रा ज़र्रा रब दी निशानी||
तेरा आलम शत-सौ हज़ारां,
पावे ज्यूँ ज्यूँ बढ़े विस्तारा|
एक आलम ते सब सध जावे,
गोरख धंधा खूब सँवारा||
सूरत जहाँ की खूब सयानी|
ज़र्रा ज़र्रा रब दी निशानी||
लेखक- रावत
Tuesday, January 26, 2010
Friday, January 1, 2010
Monday, December 7, 2009
इक़बाल : ए हकीक़ते-मुतज़र
कभी, ए हकीक़ते-मुतज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
कि हज़ारों सिज्दे तड़प रहे हैं मेरी जबीने-नियाज़ में
जो मैं सर-ब-सिज़दा हुआ कभी, तो ज़मी से आने लगी सदा,
तेरा दिल तो है सनम-आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
ना वो इश्क़ में रहीं गर्मियां, न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ,
ना वो गज़नवी में तड़प रही, ना वो ख़म है ज़ुल्फे- अयाज़ में
ना कहीं जहाँ में अमाँ मिली, जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली,
मेरे जुर्मे-खाना ख़राब को, तेरे अफ़्वे-बंदानवाज़ में
तू बचा-बचा के न रख इसे, तेरा आइना है वो आइना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीज्तर है निगाहे-आइनासाज़ में
Thursday, November 5, 2009
Sunday, November 1, 2009
Saturday, October 31, 2009
Tuesday, October 27, 2009
Sunday, October 18, 2009
Friday, October 9, 2009
ग़ालिब: दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है!
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है!
आखिर इस दर्द की दवा क्या है!
हम हैं मुश्ताक और वो बेज़ार,
या इलाही ये माज़रा क्या है!
सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं,
अब्र क्या है, हवा क्या है!!! दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है!
जान तुम पे निसार करता हूँ,
मैं नहीं जानता वफ़ा क्या है?
जब की तुझ बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा, ए खुदा क्या है!!!
मैंने माना की कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है!!!! दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है!
ज़रा सी बात पे वो जग हंसाइयाँ दे कर
ज़रा सी बात पे वो जग हंसाइयाँ दे कर,
चला गया मुझे वो कितनी जुदाइयाँ दे कर,
चलो हर्फ़-ए-तमन्ना उसी के नाम करे,
के जिस ने क़ैद किया है रिहाइयाँ दे कर,
मगर वहाँ तो वही ख़मोशी का पहरा था,
मैं आ गया तेरे दर से, दुहाईयाँ दे कर,
अजीब शख्स के वो मुझ से बद-गुमाँ ही रहा,
के जिसको पाया था मैंने खुदाइयाँ दे कर,
हूँ कितना सादा समझता था बच रहूँगा सफी,
ख्याल-ए-यार को शोला नवाइयां दे कर
ज़रा सी बात पे वो जग हंसाइयाँ दे कर,
चला गया मुझे वो कितनी जुदाइयाँ दे कर,
Ghazal by Naseer Turabi
तरके ताल्लुकात पे रोया ना तू , ना मैं,
लेकिन ये क्या की, चैन से सोया ना तू , ना मैं,
जब तक बिका ना था, तो कोई पूछता ना था,
तूने मुझे खरीद के अनमोल कर दिया,
वो हमसफ़र था, मगर उस से हम-नवाई ना थी,
की धूप छाँव का आलम रहा, जुदाई ना थी,
सुना है, गैर की महफ़िल में तुम ना जाओगे,
कहो तो आज सजा लूं गरीब खाने को,
कागा सब तन खाइयो, मोरा चुन चुन खाइयो माँस,
दो नैना मत खाइयो, इन्हें पिया मिलन की आस,
बिछड़ते वक़्त उन् आँखों में थी, हमारी ग़ज़ल,
ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई ना थी,
तेरी सूरत से नहीं मिलती किसी की सूरत,
हम जहाँ में तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं,
अजीब होती है राहे सुखन भी देख नसीर,
वहाँ भी आ गए जहाँ रसाई ना थी,
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